Posts

Hindutva, Nationalism, Development & BJP losing state after state.

हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, विकास और राज्य पर राज्य हारती भाजपा कुछ साल पहले जब कांग्रेसनीत यूपीए के शाषनकाल में अर्थव्यवस्था, महँगाई, बेरोजगारी, राष्ट्रीय सुरक्षा और अन्य कई मुद्दों पर जनता में निराशा का दौर था तब नरेंद्र मोदी भारतीय जनता पार्टी की तरफ से जनता के सामने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में अच्छे दिन लाने के सपने दिखाकर सत्ता में आये। पर उनसे बहुत ज्यादा उम्मीदें लगाने वाली जनता को उनके कार्यकाल के पहले ही वर्ष में उनसे निराशा होने लगी। फिर भी नरेंद्र मोदी जनता में लोकप्रिय बने रहे और उनके नेतृत्व में भाजपा ने कई राज्यों के चुनाव जीते। हालांकि कुछ राज्यों जैसे कि दिल्ली और बिहार में उनका जादू नहीं चला। सबका साथ और सबका विकास के नाम पर वोट माँगने के बाद केंद्र की भाजपा सरकार ने विकास के नाम पर कुछ ख़ास किया नहीं। अर्थव्यवस्था, महँगाई और बेरोजगारी की स्थिति सुधारने के लिए सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाये। इस पर भी अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने के लिए छद्म धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनाने से हिंदुत्व के नाम पर भाजपा को वोट देने वाला अधिकतर हिन्दू वोटर नाराज हो ग...

How to curb economic slowdown ?

आर्थिक मंदी को कैसे नियंत्रित किया जाये ? इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था में आयी हुई मंदी को लेकर देश में तरह-तरह की चर्चायें हो रही हैं। विपक्ष इसे सरकार की नाकामी के रूप में प्रचारित कर रहा है। बहुत ना-नुकुर करने के बाद सरकार ने स्वीकार किया है कि इस समय अर्थव्यवस्था मंदी का सामना कर रही है और वित्तमंत्री जी ने इससे निपटने के लिए कुछ कदम उठाये हैं। पर अर्थशास्त्री उन्हें अपर्याप्त मानते हैं। आखिर क्या है ये मंदी और इससे देश की अर्थव्यवस्था कैसे प्रभावित होती है? सरल शब्दों में कहें तो जनता के पास धन की कमी ही आर्थिक मंदी है क्योंकि जनता के पास धन के कमी होने से उसकी क्रय शक्ति में कमी आती है जिससे वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार कम हो जाता है और अंततः इससे कर संग्रहण में भी कमी आती है जिससे सरकारी खजाने में धन की कमी हो जाती है। अब यहाँ पर प्रश्न ये उठता है कि व्यवस्था में धन की कमी कैसे हो जाती है? यहाँ पर अर्थशास्त्र के एक बहुत ही साधारण से सिद्धांत पर गौर करना होगा। और वो यह है कि जिस प्रकार मनुष्य के शरीर में रक्त का महत्व होता है, वैसा ही महत्व समाज में धन का होता है। जैसे ...

Is increasing fines the only solution for road safety?

क्या सिर्फ जुर्माना बढ़ाकर दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है ? इस समय पूरे देश में नये मोटर व्हीकल एक्ट की चर्चा जोरों पर है। इसमें जुर्माने की राशि को इतने अतार्किक रूप से बढ़ा दिया गया है कि देश के कुछ राज्यों ने तो इसे लागू करने से साफ़ इंकार कर दिया है तो कुछ में अभी तक विचार-विमर्श चल रहा है। गुजरात ने तो इसे लागू करने के बाद भी जुर्माने की रकम में नब्बे प्रतिशत तक कटौती कर दी है। अपने पिछले लेख में मैंने इस नए अधिनियम की उपयोगिता की समीक्षा की थी। अतार्किक रूप से बढ़े हुए जुर्माने की रकम के कारण जनता को परेशानियाँ हो रही हैं। पूरे देश में इस अधिनियम के विरुद्ध लोग आवाज उठा रहे हैं। पर हर बार नितिन गडकरी जी यही तर्क देते हैं कि उनका उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं को रोकने का है। क्या वास्तविकता में केवल जुर्माने की रकम को बेहिसाब बढ़ाने से सड़क दुर्घटनाएं रुक जाएंगी और यातायात सुधर जाएगा? जमीनी हकीकत तो कुछ और ही बयाँ करती है।  सबसे पहले हम यदि सड़कों की बात करें तो उनकी खराब स्थिति के लिए किस पर जुर्माना लगाया जाये? गड्ढेदार ऊबड़-खाबड़ सड़कों के कारण कितनी दुर्घटनाएं हर साल होती हैं...

New Motor Vehicle Act : Monetary Torture on Public.

नया मोटर वाहन अधिनियम : जनता पर आर्थिक अत्याचार भारत की भाजपानीत केंद्र सरकार ने देश में १ सितम्बर २०१९ से नया मोटर वाहन अधिनियम लागू किया है। इस बिल के पास होने से पहले ही इस पर पूरे देश में चर्चाओं का बाजार गर्म था। अब इसके लागू होने के बाद से इस बिल की प्रासंगिकता पर बहस बढ़ गयी है। पश्चिम बंगाल, पंजाब और मध्य प्रदेश की सरकारों ने इस बिल के प्रावधान लागू करने से साफ इंकार कर दिया है। इस बिल में कुछ ऐसे विचित्र प्रावधान किये गए हैं कि जनता का एक बड़ा वर्ग इसका विरोध कर रहा है। उनमें सबसे मुख्य कारण है कि जुर्माने की राशि को बेहिसाब तरीके से बढ़ा दिया गया है। पहले जो जुर्माने की रकम न्यूनतम सौ रूपये से अधिकतम पाँच हजार रूपये तक थी अब उसे बढ़ाकर न्यूनतम पाँच सौ रूपये से अधिकतम एक लाख रूपये तक कर दिया गया है। बिना लायसेंस वाहन चलाने और रेड लाइट जम्प करने जैसे सामान्य अपराधों के लिए भी सजा का प्रावधान करके जुर्माने की रकम को बेहिसाब बढ़ा दिया गया है। पहले ही महँगाई की मार से परेशान जनता पर और अतिरिक्त आर्थिक बोझ लाद दिया गया है।  देश की आबादी बढ़ने के साथ ही देश में निजी...

Black Money : Will it ever be used for people's welfare?

काला धन : क्या कभी जनता की भलाई के लिये उपयोग हो पायेगा ? काला धन यानि कि किसी गैर कानूनी या फिर कानूनी तरीके से की गयी कमाई जिसे आयकर विभाग से छिपाकर रखा गया हो और जिस पर आयकर जमा ना किया गया हो। विगत कुछ वर्षों से ये दो शब्द भारत के जनमानस में चर्चा का विषय बने हुए हैं। एक स्वामी जी और एक समाज सुधारक ने इस मुद्दे को इतना उठाया कि देश भर की जनता का ध्यान इस पर गया और ये विषय बीते सालों में हुए कुछ आंदोलनों का मुख्य हिस्सा भी बन गया। लगभग सभी राजनितिक दलों ने काला धन रखने वालों को दण्डित करने और विदेशों में जमा काला धन भारत में वापस लाने के चुनावी वायदे किये पर इस वायदे को पूरा किसी ने नहीं किया। आंदोलन करने वाले स्वामी जी का व्यापर खूब अच्छे से चल पड़ा और समाज सुधारक को सक्रिय राजनिति में मत्वपूर्ण पद भी मिल गया। चुनाव जीतने के बाद सब इस विषय के ऐसे नकारने लगे जैसा कि और भी बहुत से चुनावी वायदों के साथ होता आया है। आखिर ऐसी भी क्या बात है इस काले धन में ? बात बिल्कुल सीधी सी है कि काला धन भ्र्ष्टाचार का ही दूसरा रूप है जिसकी जड़ें हमारी व्यवस्था में इतनी ...

Demonetization : How much successful in stopping corruption ?

नोटबंदी : भ्रष्टाचार रोकने में कितनी सफल ? लगभग तीन वर्ष पहले जब आठ नवम्बर २०१६ की शाम को माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने अचानक नोटबंदी की घोषणा की तो पूरा देश सकते में रह गया। उनका वक्तव्य पूरा होने से पहले ही कॅश डिपाजिट मशीनों के आगे लम्बी कतारें लग गयीं। सब हड़बड़ी में थे कि जल्दी से जल्दी अपने हजार और पाँच सौ रूपये के नोट अपने बैंक खातों में जमा कर दें। ये क्रम उसके बाद कई दिनों तक चला। जनता से लेकर बैंक अधिकारी तक सब परेशान हो गए। अचनाक से सौ, पचास, बीस और दस रूपये के नोटों तक की पूछ परख बढ़ गयी। बाजार में नकदी की कमी हो गयी। सरकार ने केवल चार हजार रूपये बैंक से निकालने का नियम बना दिया और वो भी मात्र दो हजार रूपये के दो नोट। हजार और पाँच सौ के पुराने नोट बंद होने के बाद इतने बड़े नोट के खुल्ले पैसे देना दुकानदारों के लिए भी मुश्किल हो गया। सबसे ज्यादा परेशानी शहरों में रहने वाले निम्न वर्ग और गाँवों में रहने वाले लोगों को हुई। जिन लोगों के बैंकों में खाते तक नहीं थे और जो मोबाइल फोन, स्मार्ट फोन इत्यादि चलाना नहीं जानते थे, वो लोग भला पेटीएम या नेट बैंकिंग स...

Marriage : It is time to have new laws for it.

विवाह : अब नए कानूनों की आवश्यकता है  यदि ये कहा जाये कि विवाह मनुष्य जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। विशेषकर सनातन हिन्दु धर्म में तो विवाह मनुष्य जीवन के सोलह संस्कारों में से एक है जो मनुष्य को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कराकर उसके पारिवारिक जीवन का प्रारम्भ करवाता है। परिवार ही समाज का आधार होता है। पारिवारिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनुष्य श्रम करता है। श्रम करने वाला मनुष्य कर के रूप में जो धन चुकाता है, उसी से शाषक पूरी जनता और राष्ट्र के विकास के लिए कार्य करते हैं। श्रम करके धन कमाने वाले मनुष्य की दान-दक्षिणा से ही धर्म-कार्य होते हैं और सन्यासी एवं ब्राह्मण वर्ग का जीवन-यापन होता है। महाभारत में तो ये भी कहा गया है कि धरती पर जितने भी कार्य होते हैं, उन सभी के मूल में गृहस्थ धर्म ही है। सनातन धर्म में मनुष्यों के लिए निर्धारित चार आश्रमों में से केवल गृहस्थ आश्रम ही ऐसा एकमात्र आश्रम है जिसमें मनुष्य धन कमाने के लिए उद्यम करता है। गृहस्थ आश्रम में ही मनुष्य विवाह करके संतान उत्पन्न करता है जो ...